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Monday, May 12, 2008

तमस


घर का कोना कोना सूना है
ह्रदय मे तम की वीरानी है
चाहुओर दीप उजियारा है
अपनी दीवाली काली है

रहता था अँधेरा जो मेरे मन मे
उतर आया है घर आँगन मे
हर अटारी दीप सजे, औ' रंगोली है
अपना तो मन भींगा, आँखे गीली है

चहुँ ओर धूम धडाका, शोर मचा है
लक्ष्मी की सवारी आई है
अपने घर मे गहन सन्नाटा
अभी अभी हुई अन्तिम विदाई है

अभिषेक आनंद - पुराने पन्नों से (दीवाली : जब बड़े पापा के स्वर्गवास हुआ था)

मेरी कविता

रूठ गए है अपने हम से
बिसर गए सपने नयन से
टीस रहे है घाव ह्रदय के
पिघल रहे नीर नयन से
कही नही सुरभि जीवन मे
बसता है दर्द मन के अगन मे
जीवन है जब भावों से रीता
मैं क्या लिखूं कोई कविता

अभिषेक आनंद - पुरानी पन्नों से