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Friday, May 16, 2008

एक चेहरा


चेहरा (जिसे भुलाना भ्रम होगा)
जिसने मुझे इस हद तक
बेचैन किया
कि मेरी कविता
शब्द से उठकर भाव बन गई

इक चेहरा,
जो नही है महज चेहरा
पर चेहरा शरीर नही होता
यह तो फकत होता है एक चेहरा
जिसे रख भी नही सकते अपने पास

चेहरा शरीर तो नही
पर जुड़ा होता है एक शरीर से
चाह कर भी अलग नही हो सकता
इसकी पहचान है शरीर से
और शरीर की पहचान है चेहरा

चेहरा
दिल का आइना होता है
पर दिल नही होता
दिल मे होती है भावनाये
चेहरा भावों का दर्पण होता है

चेहरा
कुछ नही होता
चेहरा भी नही
यह तो भ्रम होता है
भ्रम भी नही
भ्रम की परछाई होता है चेहरा

पर चेहरा कुछ तो होता है
तभी तो मेरी कविता
शब्द से उठ कर भाव बन जाती है

अभिषेक आनंद

Monday, May 12, 2008

मेरी कविता

रूठ गए है अपने हम से
बिसर गए सपने नयन से
टीस रहे है घाव ह्रदय के
पिघल रहे नीर नयन से
कही नही सुरभि जीवन मे
बसता है दर्द मन के अगन मे
जीवन है जब भावों से रीता
मैं क्या लिखूं कोई कविता

अभिषेक आनंद - पुरानी पन्नों से

Sunday, May 11, 2008

प्रवासी

पश्चिम से जब चलती है हवाएँ
तुमसे कुछ कहती है हवाएँ
सुनना बेटा कान लगा कर
गुनना बेटा ध्यान लगा कर
इनमे छुपी है कुछ कथाएँ
कितने आंसू कितनी व्यथाएं
टूट गए जो जड़ से अपने
छुट गए जो घर से अपने
होठों पर होती है हँसी
दिल मे होता है रुदन
याद आती है उन्हें भी
अपनी धरती अपना वतन
रोज़ी रोटी के लिए मजबूर है
पर सारी दुनिया मे मशहूर है
तिलीस्मों सी इनकी कहानी है
ह्रदय मे एक रवानी है
देश तजा पर संस्कृति नही
परदेश मे भी हिन्दुस्तानी है...


अभिषेक आनंद - पुराने पन्नों से

सन्नाटे की आवाज

सन्नाटा अच्छा लगता है
शहर के वीराने मे
आसमां मे छाई हो
धुंध भरी बदली
थकने लगे पाँव जब
क्षितिज को पाने मे
सन्नाटा अच्छा लगता है
रात के स्यांह अंधेरों मे
अजनबी हो जाती हैं साँस
अपनी ही आवाज जब
घुटने लगे सीने मे
सन्नाटा अच्छा लगता है...

अभिषेक आनंद - पुराने पन्नों से